Sunday, April 10, 2016

रवीश कुमार को बिल्कुल मत बख्शिए



रवीश कुमार को आजकल सोशल मीडिया पर बहुत गालियां दी जा रही हैं। ये वही सोशल मीडिया है जिसकी वजह से रवीश अपनी एक अलग पहचान बनाने में कामयाब हुए । आज देश के चंद नामी-िगरामी टीवी पत्रकारों में शुमार किए जाने वाले रवीश काफी दुखी भी हैँ। अपने उपर लगातार होने वाले हमले से क्षुब्ध होकर उन्होंने फेसबुक से दूरी बनाई और अब अपने प्राइम टाइम शो में गाली वाले पूरी घटना का जिक्र किया। दुखी नहीं काफी दुखी दिखे। दरअसल इन दिऩों गजब का ट्रेंड चला है जो आपकी पसंद की बात नहीं करे गैंग बनाकर उसके पीछे पड़ जाओ। अब ये बताइए कि यह कैसे संभव है कि कोई सार्वजनिक जीवन का व्यक्ति सबको खुश कर पाए। मैं तो कहता हूं कि आपलोग रवीश कुमार को बिल्कुल मत बख्शिए, खूब भला-बुरा कहिए , मैं गाली का समर्थन नहीं करता लेकिन अगर आपके संस्कार में हैं तो खूब गाली भी दीजिए। लेकिन इससे पहले अपने गिरेबां में एक बार थोड़ी देर के लिए ही सही झांककर देखिए। रवीश के समानांतर जो पत्रकार दिखते हैं उनको भी देखिए उनके काम और उनके कारनामे भी देखिए, देखिए कि उन्होंने या आपने जो अपने जीवन में किया है उससे देश का कितना भला हुआ है या फिर कितना भला होगा? जब रवीश सूट-बूट वाले टीवी पत्रकारों, एंकर्स के बारे में कहते हैं कि जिन-जिन जगहों पर रवीश गए हैं वहां उनको जाने में दशक बीत जाएं तो इसका मतलब यह नहीं कि वो देश-विदेश घूमने की बात करते हैं वो अपने ही देश के उन हिस्सों की बात करते हैं जहां जाना एक पत्रकार का फर्ज होता है लेकिन न तो आज उन खबरों से सरोकार दिखता है और न हीं लोगों की उसमें दिलचस्पी । कम से कम रवीश खुल कर कहते तो हैं कि वो वही करते हैं जो उनका जमीर कहता है लेकिन उनका क्या जिनका जमीर मर चुका है। जानते हैं जब आप अपने तर्कों में कमजोर पड़ जाते हैं , उनसे हार जाते हैं तो आप शार्ट कट तलाशते हैं और गाली-गलौज पर उतर जाते हैं। क्यूंकि उसमें तथ्यों पर कोई बात नहीं करनी होती। इस पूरे मामले को जरा ढंग से समझने की जरुरत है, मर्सिया पढ़ते टीवी न्यूज के दौर में सोशल मीडिया बंदर के हाथ उस्तरा की तरह है। किसी भी व्यक्ति की लानत-मलानत करनी हो तो यहां पर फौज छोड़ दीजिए, ये फौज न आगे देखती है न पीछे, न किसी घटना के तह तक जाती है बस भेड़ों की झुंड की तरह बहने लगती है। और आपको जरुर जानते होंगे कि देश का ज्यादातर हिस्सा न तो इस सोशल मीडिया की जद में आया है और न हीं  वहां की समस्या से उसका सरोकार है। बावजूद इसके आने वाले दिनों में यही भविष्य होने वाला है और अभी यह ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां हमें सतर्क रहना है औऱ कई मामलों में बेपरवाह भी। अगर आप कुछ अच्छा करना चाहते हैं तो इसका इस्तेमाल कीजिए , सतर्क रहिए और अगर आपको गालियां पड़ रही हैं तो बेपरवाह हो जाइए… सच मानिए दूसरा कोई रास्ता नहीं। 

हम बात कर रहे थे रवीश कुमार की तो आप ये बताइए कि पिछले दो सालों में ऐसा क्या हो गया िक धीरे धीरे रवीश सोशल मीडिया के Blue eyed Boy से खलनायक में तब्दील हो गए। रवीश को भी जरा उसपर गौर करना चाहिए। बीजेपी की सरकार बनने के बाद मोदी विरोध की तेज चली आंधी में अच्छे कर्म भी धुल गए। जितना विरोध इस मौजूदा सरकार का हर मामले पर हो रहा है उतना आजाद हिंदुस्तान में किसी सरकार का नहीं हुआ , इमरजेंसी के बाद इंदिरा गांधी का भी नहीं। तो क्या मोदी गलत हैं.. क्या उनकी सरकार हर फैसले देश की जनता के खिलाफ कर रही है या फिर कुछ और बात है। रवीश कुमार के साथ किया जाने वाला गलत व्यवहार उतना ही गलत है जितना मोदी सरकार की हर नीतियों का विरोध। सरकार अगर गलत करती है तो उसका विरोध कीजिए लेकिन अगर कुछ अच्छा हो रहा है तो उसकी तारीफ भी होनी चाहिए। कन्हैया मामले में पटियाला हाउस की घटना ने एक गैर मौजूं व्यक्ति को खबरों के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया। पत्रकारों के साथ हुई बदसलूकी पर अगर टीवी स्क्रीन ब्लैक किया जा सकता है तो श्रीनगर में तिरंगा फहराने वालों पर लाठीचार्ज के बाद भी टीवी स्क्रीन ब्लैक किया जाना चाहिए। जब आप अपने जमीर की बात करते हैं तो निरपेक्ष नहीं हो सकते। फिर आपको यह भी देखना होगा कि जिस व्यक्ति के संस्थान में आप नौकरी कर रहे हैं उसका जमीर क्या कहता है। जब आप अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देते हैं तो आपको एक लकीर खींचनी होगी कि नीरा राडिया के साथ संबंधों के उजागर होने के वक्त बरखा दत्त के साथ आप खड़े हैं या कि नहीं। 


अन्ना के आंदोलन के वक्त सांप-बिच्छू से छुटकारा पाकर टेलीविजन न्यूज ने खबरों का रुख किया और कुछ साख बनाई, लेकिन जिस तरह से अरविंद केजरीवाल और उनके गैंग ने देश की जनता के साथ मजाक किया और टेलीविजन ने उस मजाक में उनका साथ देकर जनता के साथ धोखा किया एक बार मीडिया अपनी साख के लिए जद्दोजहद कर रहा है। हर कोई अपने सेट एजेंडा के साथ चल रहा है। निष्पक्ष का दावा ठोककर पत्रकार आजकल पक्षकार होते जा रहे हैं जबकि जरुरत जनपक्ष की पत्रकारिता की है। जमीर की आवाज सुनिए रवीश बाबू गालियों के मत डरिए। गालियां भी उसी को पड़ती है जिससे गलत लोगों को डर लगता है। तो दर्शक और पाठक लोग आप रवीश कुमार को बिल्कुल मत बख्शिए, रवीश बाबू आप गालियों से बिल्कुल मत डरिए। यह देश जमीर की आवाज सुनता है, आपकी कई खबरों से इत्तेफाक नहीं रखते होते हुए भी हम आपके साथ हैं क्यूंिक इस भेड़ की भीड़ में कम से कम आप नहीं हैं। 

Tuesday, April 5, 2016

आज मदहोश हूं मैं ः िबहार में शराब बंद

बिहार में आज से देशी-विदेशी सभी किस्म के शराब पर पाबंदी लगा दी गई। न तो अब शराब बेची जाएगी और न ही किसी होटल - रेस्तरां को लाइसेंस मिलेगा। कमाल का फैसला है, अगर आप देश के विकास में अपना योगदान देना चाहते हैं तो किसी भी हिस्से में होने वाले अच्छे काम को सराहा जाना चाहिए और किसी भी हिस्से में बुरे काम की निंदा की जानी चाहिए। वैसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए जैसा आजकल भारत माता की जय वाले मामले में हो रहा है। बिहार को अगर पिछले पच्चीस सालों में देखें तो अगर कुछ अच्छे काम हुए हैं तो वो नीतीश कुमार के फैसले से ही हुए हैं। हालांकि नीतीश के सुशासन में शिक्षा और स्वास्थ्य अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है और सहयोगी दल के नेता-कार्यकर्ता फिर उसी रास्ते पर लौटते दिख रहे हैं जिनका विरोध कर नीतीश कुमार ने पहली बार सत्ता पाई थी। इन सबके बीच नीतीश कुमार और उनके कैबिनेट के इस फैसले की जितना सराहना की जाए कम है। शराब से होने वाली समस्याएं और बरबादियां को वही समझ सकता है जिसने उसे करीब से देखा हो। इस मामले में मेरे दो किस्म के अनुभव हैं। घर में, परिवार में कोई व्यक्ति इसका सेवक नहीं है लिहाजा व्यक्तिगत समस्याएं कभी नहीं हुईँ। गांव में जब था तब भी और शहर में आया तब भी। जबकि घर में किसी के सेवन नहीं करने के बावजूद शराब का दंश बड़े करीब से देखा। यहां नाम लेना उचित नहीं है लेकिन अपने गांव में और समाज में इसकी चंगुल में बरबाद होते परिवार देखा है। स्वभाव और संस्कार से ठीक ठाक लोगों को शराब के नशे में वो करते देखा है जिसकी कल्पना से सिहरन पैदा हो। मैं अब उन परिवारों के लिए थोड़ा सुखी हो सकता हूं, उनके बच्चों के भविष्य के लिए थोड़ा निश्चिंत भी। क्यूंकि अगर यह शराब नहीं बंद होती तो मैं जानता हूं कि वो अपने जनाजे से पहले अपने बच्चों के भविष्य का जनाजा निकाल चुके होंगे। लिहाजा नीतीश कैबिनेट के इस फैसले ने अगली पीढ़ी के लिए काफी सुकून दिया है। 

पिछले विधानसभा चुनाव में अपने दौर के सिलसिले में कई ऐसे गांव और बस्तियों में गया जहां की सबसे बड़ी समस्या ही शराब है। कुछ इलाकों में नई पीढ़ी के कुछ जागरूक किशोरों ने खुलेआम कहा कि "वोट उसी को जो शराब न दे किसी को"। जबकि हम सब जानते हैं कि चुनाव के दौरान मामला ठीक इसके उलट होता है। पैसे के साथ सबसे ज्यादा शराब बांटा जाता है। नीतीश कुमार का यह फैसला और वो भी पंचायत चुनाव के दौरान, बड़ा ही साहसिक फैसला है। हालांकि िबहार में पार्टियां पंचायत के चुनाव नहीं लड़तीं लेकिन फिर भी वोटर और कैंडिडेट्स तो विचारधाराओं के साथ बहते ही हैं। 


अभी अगले ही हफ्ते नीतीश कुमार की पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव हो जाएगा और अनुमानतः नीतीश कुमार के हाथ में ही पार्टी की बागडोर भी आ जाएगी।  ऐसे में बिहार में पूर्ण तौर पर शराब बंदी का फैसला निस्संदेह नीतीश कुमार के पक्ष में जाएगा। पिछले लोकसभा चुनाव से पहले जब जनता दल यू एनडीए से अलग हुई तो कई किस्म की चर्चाएं थी। एक मेरे जानकार ने कटाक्ष में कहा था कि नरेंद्र मोदी तो चुनाव प्रचार में बोलते हैं देश को गुजरात बना दूंगा, नीतीश कुमार क्या बोलेंगे .. देश को बिहार बना दूंगा। उनकी बात सोलह आने सच थी, और आज यह भी सच है कि बिहार भी आज ड्राइ स्टेट की कैटेगरी में जा खड़ा हुआ है। देश के चार राज्यों में एक। और देखिए न कितनी दिलचस्प बात है शराब के साथ …. शराब बनाने वाली कंपनी दिवालिया…. उसे कर्ज देने वाला बैंक खस्ताहाल…… पीने वाले लोग कंगाल…. आखिर यह पैसा जाता है कहां । आखिर में आज मदहोश हूं मैं। 

Wednesday, March 23, 2016

ये ट्वीट बहुत कुछ कहता है

Published on 14th March 2016 in Inext
क्या माना जाए लोकतंत्र के स्तंभ धीरे धीरे खोखले होते जा रहे हैं या फिर कुछ उम्मीद बाकी है। खासकर जब हम बात लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की करते हैं तो चिंता बढ़ने लगती है। पत्रकारिता का दिनोंदिन ह्रास हुआ है इसमें कोई शक नहीं है लेकिन जब बैंको के हजारों करोड़ का कर्ज लेकर फरार कोई शख्स मीडिया को धमकाए और बोले कि खामोश ..पोल खोल दूंगा तो चिंता और बढ़ जाती है। आज के दौर में जब हम मीडिया की बात करते हैं तो उसमें प्रिंट मीडिया हाशिए पर नजर आता है। सोशल मीडिया परिपक्वता से अभी काफी दूर है और टेलीविजन को तो जैसे शैशवकाल में ही पीलिया हो गया। पिछले कुछ समय का गौर करें तो टेलीविजन न्यूज ने क्या कमाल किया है देश में दिख रहा है। देश में आंदोलन की बयार से लेकर दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री तक मीडिया की देन हैं खासकर टेलीविजन मीिडया की। आजकल ही देखिए तीन खबरें पिछले तीस दिन से ज्याादा समय से स्क्रीन पर तैर रही हैं, और सारी एक निश्चित एजेंडे के साथ । चाहे वो कन्हैया हो, श्री श्री रविशंकर का संगीतनाद हो या फिर विजय माल्या। इन खबरों के अलावा टेलीविजन पर कुछ नहीं दिखता । और अब तो एक दूसरे चैनल वाले खुलेआम आपसी रिश्तेदारी - दुश्मनी भी निपटाने में जुटे हैँ। बात दिखती छोटी जरुर है लेकिन बहुत गंभीर है। हमें तो लगता है िक लोकतंत्र के किसी भी समस्या से ज्यादा गंभीर , अति गंभीर। शायद जीडीपी के गिरते स्तर से भी ज्यादा गंभीर है देश में मीडिया का गिरता स्तर। जल्दी, सबसे पहले, सबसे आगे और सबसे खनकदार दिखाने की होड़ में खबरों और देश दोनों से समझौता हो रहा है। गौर से देखिए कन्हैया मामले पर वीडियो पर विवाद जारी है, हालांकि किसी भी वीडियो को फर्जी कहकर मुद्दों को भटकाना भी एक फैशन बन गया है। लेकिन फिर भी कन्हैया और जेएनयू प्रकरण में जितना बड़ा गुनहगार वो वकील समुदाय है जिसने पटियाला हाउस कोर्ट में मारपीट की उससे बड़ा गुनहगार है वो मीडिया समुदाय है जिसने चौबीसों घंटे स्क्रीन पर रंग-बिरंगे थोबड़ों से यह बहस करवाई और बार-बार कहलवाया कि अफजल की फांसी पर बहस होनी चाहिए । उनलोगों को स्क्रीन स्पेस दिया जिनकी नजर में आजाद कश्मीर की मांग करना, देश के टुकड़े करने की बात करना गुनाह नहीं है। ठीक उसी तरह श्री श्री रविशंकर का कार्यक्रम एक साल से भी ज्यादा पहले तय होचुका था। कार्यक्रम के जब चंद दिन रह गए तब जाकर मीडिया और पर्यावरणवादी सक्रिय हुए। मीडिया ने तूल दिया और एनजीटी की नींद खुल गई। दरअसल यह सब मामले की गंभीरता जाने बगैर अनपढ़ों की तरह व्यवहार करने का नतीजा है । एक दौर था जब प्रिंट मीडिया के पत्रकार टेलीविजन न्यूज के पत्रकारों को कम पढ़ा-लिखा मानते थे लेकिन अब जबकि प्रिंट मीडिया के कई नामचीन लोग भी टेलीविजन स्क्रीन की शोभा बढ़ाते हैं, टेलीविजन न्यूज का दिनोंदिन गिरता स्तर जरुर चिंता बढ़ाता है। अब ताजा तरीन मामले पर नजर डालिए। विजय माल्या , नाम, पहचान ,शोहरत और पैसे का मोहताज नहीं। हर तरफ विजय माल्या की चर्चा है। लेकिन विजय माल्या जब तकरीबन पांच साल से बैंकों के करीब 9 हजार रुपये पचा कर ऐश कर रहा था, कुछ को छोड़ कर मीडियाको कहीं कुछ पता नहीं था। जितनी हाय तौबा मीडिया ने अब मचाई है उतनी अगर किंगफिशर एयरलाइंस के दिवालिया होने के वक्त मचाई होती तो शायद अब तक उसके कर्मचारी अपनी तनख्वाह का इंतजार नहीं कर रहे होते । कमाल तो देखिए देश छोड़ कर बाहर जाने से एक रोज पहले तक वो संसद में देखागया और हो भी क्यूं नहीं, माननीय सांसद जो ठहरे।  जब माल्या लंदन भाग गया तब अब मीडिया और विपक्ष हंगामा मचा रहे हैं। मामला यहीं तक नहीं हैबल्कि स्तर गिरने का मामला तो अब शुरु होता है। माल्या के देश से बाहर होने की खबर फैलते ही आदतन टीवी मीडिया उसपर टूट पड़ता है। उसके सारे कच्चे चिट्ठे खंगाले जाने लगते हैं और इसी बीच जनाब माल्या का लंदन से एक ट्वीट आता है जो हाल के भारतीय मीडिया में से ज्यादातर का चेहरा बेनकाब करता है। देश के बैंको का नौ हजार करोड़ दबाकर फरार इंसान यह कहता है कि मीडिया वालों जरा होश से काम लो , तुम में से किन किन को हमने क्या - क्या सुविधाएं  मुहैया नहीं कराईं, कितना ऐश कराया सब डाक्यूमेंटेड हैं इसलिए जरा संभल कर। हालांकि कुछ पत्रकारों ने इसके विरोध में तुरंत सोशल मीडिया का सहारा लिया लेकिन किसी ने इस विरोध में अपने भोंपू टेलीविजन का इस्तेमाल अब तक नहीं किया। जिस तरीके से ट्वीट में माल्या ने टीआरपी का जिक्र किया है उसका इशारा साफ तौर पर टेलीविजन की तरफ है , हां यह चर्चा जरुर सुनी जा रही है कि खिलाया तो खाया , खबर से परहेज क्यूं करें। सवाल एक माल्या , एक कन्हैया या एक रविशंकर का नहीं है, सवाल एक अन्ना का और एक अरविंद केजरीवाल का भी नहीं है। सवाल देश का है, देश की सोच का है। एक रिपोर्टके मुताबिक इस समय बैंकों के करीब चार लाख करोड़ रुपये डूबे हुए हैं। माल्या ने जितना पचाया है वो कुल हिस्से का 5 फीसदी भी नहीं है। माल्या लंदन भागगया। जो कारोबारी 95 फीसदी पैसा डकार कर अभी देश में बैठा है क्या मीडिया उसके लंदन भागने का इंतजार कर रही है । विपक्ष और सरकार तो शायद कर ही रहे हैं। और तो और अब इन मीडिया मुगलों के बीच सरेआम तू-तू मैं-मैं भी होने लगी है, हालात ये हो गए हैं कि देश का कोई भी व्यक्ति टीवी चैनलों को देखकर साफ तौर पर यह अनुमान लगा सकता है कि फलां चैनल अमुक पार्टी का पक्षधर है। कॉरपोरेट घरानों की आपसी लड़ाई हो या  फिर सरकारी महकमे केनौकरशाहों के बीच की लड़ाई। जब भी ऐसा होता है तो भीतर की असलियत बाहर आती है। सूरत साफ होने लगती है। कई धमाकेदार खुलासे भी होते हैं जिनसे देश को लाभ भी मिलता है। मीडिया में प्राय: ऐसा नहीं था। एक मीडिया घराना, दूसरे मीडिया घराने के खिलाफ कुछ भी लिखने और दिखाने से बचताथा लेकिन इन दिनों मीडिया में एक नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है। एक चैनल दूसरे चैनल की सार्वजनिक खिंचाई में जुट गया है। एक बड़ा पत्रकार दूसरे बड़ेपत्रकार की खुलेआम खिंचाई कर रहा है। इतना ही नहीं शायद पहली बार इस मामले को सीधे दर्शकों के बीच उछाला जा रहा है। डिबेट में, सेमिनार में औरअपने-अपने टीवी स्क्रीन पर यह दिखाने की कोशिश हो रही है मेरी कमीज से तुम्हारी कमीज सफेद कैसे। दरअसल यही सोच खतरनाक है। अफजल गुरु से भी ज्यादा, उमर खालिद से भी ज्यादा और माल्या से भी ज्यादा। यह सोच बतलाती है कि मीडिया के ये दिग्गज अपने आप को बड़ा पत्रकार ही नहीं बल्कि पत्रकारिता से बड़ा मान बैठे हैं। सरकार और विपक्ष की नूरा-कुश्ती में मीडिया अपनी भूमिका निभाने के बजाय उनमें से किसी ने किसी का पैरोकार बनता जा रहा है। एक पार्टी जब विजय माल्या की बात करेगी तो दूसरी क्वात्रोची के किस्से शुरु कर देगी। एक ललित मोदी का जिक्र करेगा तो दूसरा एंडरसन को याद करने लगेगा, वो तो देश की राजनैतिक पार्टियां हैं लेकिन जब इसी सुर में टेलीविजन भी गाने लगता है तो चिंता स्वाभाविक हो जाती है। इसलिए अब वक्त आ गया है कि इन मुद्दों पर सार्वजनिक बहस हो, टेलीविजन न्यूज चैनल चलाने के लिए नियम-कायदों और उसके लाभ-हानि पर सरकार के साथ विस्तृत चर्चा हो। मैं तो कहता हूं पक्ष-विपक्ष की पत्रकारिता क्या पत्रकारिता निष्पक्ष भी नहीं होनी चािहए । पत्रकारिता जनपक्ष की होनी चाहिए । महज गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार से सम्मानित होने से देश में पत्रकारों की साख नहीं बचेगी, टीवी स्क्रीन ब्लैक करने से अघोषित आपातकाल नहीं आएगा बल्कि गणेश शंकर विद्यार्थी का छात्र बनना होगा अपने हित किनारे करके पत्रकारिता की साख बचानी होगी नहीं तो देश में अन्ना के आंदोलन होते रहेंगे और उससे अरविंद केजरीवाल सरीखे लोग दिल्ली की सत्ता पर काबिज होते रहेंगे। ललित मोदी और विजय माल्या देश के हजारों करोड़ रुपए लेकर भागते रहेंगे और हम उनके ट्वीट पर बेचैन होते रहेंगे। नीरा राडिया के टेप फिजाओं में गूंजते रहेंगे और उन टेप में शामिल होने वाले अपने को देश का बड़ा पत्रकार साबित करते रहेंगे। गौर कीजिए नीरा राडिया प्रकरण अभी तक देश भूला नहीं है उसपर माल्या का यह ट्वीट भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं है। 

सुगौली संधि के बहाने

Published on 19th March 2016 in Jansatta
200 साल बाद हम आज एक ऐसी घटना को याद कर रहे हैं जो ऐतिहासिक के साथ-साथ सांस्कृतिक भी है। ऐतिहासिक रणभूमि पर घटी यह एक ऐसी घटना है जिसके जरिए हम युद्ध नहीं वरन् संधि की बात कर रहे हैं। जी हां सुगौली संधि। पिछले सालों में भारत और नेपाल के बीच हुई सुगौली की इस संधि की चर्चा तो बार बार हुई है लेकिन जिस स्तरपर होनी चाहिए वो नहीं हुई। जैसा कि हम जानते हैं और हमने पढ़ा है, देखा है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की चर्चा में ज्यादातर इतिहासकार १७९५ के बाद एक लंबी छलांग लेते हैं और सीधे सिपाही विद्रोह पहुंच जाते हैं। इस बीच में हिंदुस्तान में घटी कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है सुगौली संधि। यह कहना ठीक नहीं कि इतिहासकारों ने सुगौली के साथ बेईमानी की है कि लेकिन यह कहना गलत न होगा कि ज्यादातर इतिहासकारों ने दो देशों के बीच घटी इस महत्वपूर्ण घटना को नजरअंदाज करके अन्याय किया है। दो देश जिसकी सीमा रेखा सैकड़ों किलोमीटर तक फैली है और जिसके दोनों तरफ एक जैसे लोग बसते हों उनके बारे में विस्तार से लिखने में क्यूं कोताही बरती गई यह समझ से परे है। वो तो इस इलाके की मिट्टी की तासीर है कि यहीं से जन्मे कुछ रचनाकारों ने सुगौली और सुगौली संधि की भूमिका से देश को अवगत कराया है। मुगलों के जाने के दौर से अंग्रेजों के भारत पर शासन के दौरान तमाम ऐसी घटनाएं घटी हैं जो भौगोलिक दृष्टि से देश के सांस्कृतिक स्वरूप से परिचित कराती है। रियासतों के साम्राज्य भारतवर्ष के उत्तर में राणा, नेवार और गोरखाओं का राज था। ये राजा भी भारत के मराठा बाजीराव और महाराणा प्रताप की तरह अपने साम्राज्य का विस्तार और हिंदू संस्कृति का विस्तार करते रहे। पहली बार में गोरखाओं ने ईस्ट इंडिया कंपनी के योद्धाओँ को पटखनी दी लेकिन धुन के पक्के गोरों ने १८१३ से १८१५ तक लगातार लड़ाई कर नेपाल को उनके पुराने इलाके तक सीमित रखा। दो साल चली लड़ाई के बाद १८१५ के दिसंबर में यहीं सुगौली के धनही गांव में संधि हुई, और ४ मार्च को दोनों साम्राज्यों ने इस संधि को स्वीकार कर लिया।
इसी अवसर पर दौ सौ साल बाद भारत-नेपाल के संबंधों को ध्यान में रखते हुए ४-५ मार्च २०१६ को सुगौली संधि समारोह का आयोजन हुआ। इस आयोजन में दोनों देशों के चिंतक, रचनाकार, पत्रकार , इतिहासकार और राजनेता शामिल हुए।   दो दिनों तक यहां भारत-नेपाल के इतिहास और उनके मौजूदा संबंधों पर विस्तार से चर्चा हुई। हालांकि पहले से तय कार्यक्रम और तमाम प्रशासनिक तैयारियों  के बावजूद बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद ऐन मौके पर क्यूं नहीं आए यह कौतूहल का विषय है और हमारी जानकारी के हिसाब से चुंकि रामनाथ कोविंद संघ के पुराने कार्यकर्ता हैं और उनका मंच से कुछ भी कहना या फिर उनके मंच से किसी मेहमान के द्वारा कुछ भी कहा जाना सीधे केंद्र सरकार से संबंध रखता लिहाजा दिल्ली के आदेश का पालन करते हुए उन्होंने डिबेट में हिस्सा लेने से परहेज किया। लेकिन परिचर्चा के दौरान दोनों देशों से आए वक्ताओं ने भारत-नेपाल संबंधों पर और उसके इतिहास पर खुल कर बोला। एक तरफ जहां सभी वक्ताओं ने भारत-नेपाल के संबंधों और नेपाल के मौजूदा भौगोलिक स्वरूप के लिए इस संधि को महत्वपूर्ण माना वहीं मौजूदा परिदृश्य में मधेशी आंदोलन और मधेश की मांग के मुद्दे को दोनों देशों के संबंधों के लिए जरुरी तथ्य माना। दरअसल हाल की घटनाओँ पर गौर करें तो भारत और नेपाल की चर्चा के दौरान नेपाल के मौजूदा संकट और मधेशी आंदोलन से अछूता नहीं रहा जा सकता और फिर जब हम चर्चा भारत-नेपाल के बीच हुई संधि की कर रहे हों तो तब तो बिल्कुल नहीं। हाल के कुछ महीनों में नेपाल में संविधान के विरोध में जो आंदोलन हुआ है उसने देश की अर्थव्यवस्था की चूलें हिला दी हैं। बंद एसी कमरे में चाहे जितने लंबे भाषण दिए जाएं लेकिन जब उन इलाकों के लोगों की परेशानियों पर गौर किया जाता है तो लगता है इससे मुंह मोड़ना नाइंसाफी होगी। 
सुगौली संधि स्वरूप जो जगह-जमीन नेपाल को ईस्ट इंडिया कंपनी ने १८१६ में सौंपी उसमें१८५७ के बाद बढ़ोतरी कर दी गई। १८५७ के विद्रोह के वक्त सुगौली में ब्रिटिश छावनी स्थापित हो चुकी थी और इस छावनी से उठी विद्रोह की आग को दबाने में नेपाल के राजा ने ब्रिटिश सरकार का साथ दिया था। हालांकि हो सकता है कि वो उनकी तात्कालिक मजबूरी रही होगी लेकिन ब्रिटिश इंडिया ने ईनाम स्वरूप जो तराई का इलाका नेपाल को सौंपा उससे नेपाल को लाभ हुआ और भारत के सीमावर्ती इलाके में लोगों को यह बात आज भी कचोटती है। बड़े भाई का रोल अदा करने के बाद भी उसे वो सम्मान नहीं मिला, यह कहना गलत न होगा कि इसके पीछे भी ब्रिटिश इंडिया की कुछ अलग सोच रही होगी। सुगौली से ज्यादा बेहतर जल जमीन देश के कई हिस्सों में कईयों की होगी लेकिन ऐसा इतिहास कितनों का होगा इसमें संदेह है। वरिष्ठ दिवंगत रचनाकार रमेशचंद्र झा ने तो सुगौली का ऐसा इतिहास लिखा है जिसे बार-बार पढ़ने के बाद भी लगता है कि एक बार फिर पढ़ें क्यूंकि एक-एक कर दृश्य आपके सामने आते हैं। आज इस संधि को हुए दौ सौ साल हो चुके हैं। गंडक में कितना पानी बहा होगा इसकी कल्पना नहीं की जा सकती है लेकिन इस संधि के बारे में सही जानकारी न देकर एक तरफ जहां इतिहासकारों से गलतियां हुई हैं उससे ज्यादा गलतियां यहां के बाद की पीढ़ी ने की जिन्होंने इस संधि का उचित महत्व नहीं जाना और न ही जानने की कोशिश की। यह तथ्य सर्वविदित है कि अगर आप अपनी संस्कृति, अपने धरोहर और अपने इतिहास को जिंदा नहीं रखेंगे तो कोई और उसे तबाह करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। और इसी का नतीजा है नेपाल और भारत के बीच पूरे तराई इलाके में मधेश मुद्दा सुरसा की मुंह की तरह बड़ा होता जा रहा है।
इस समारोह में शामिल हुए नेपाल के पूर्व सांसद गोपाल ठाकुर ने बड़ी अहम बात उठाई - 2011 की जनगणना के मुताबिक नेपाल में ४८ फीसदी आबादी मधेशियों की है. इसमें नेपाल के मूल और भारत से गए दोनों शामिल है. यहां की बोली मैथिली, भोजपुरी, बज्जिका और नेपाली है. पर दिक्कत ये है कि नेपाल के ५६ लाख लोगों यानि कि मधेशियों को अब तक वहां की नागरिकता नहीं मिल पाई है. जिन्हें नागरिकता मिली भी है, वह किसी काम की नहीं क्योंकि उन्हें न ही सरकारी नौकरी में जगह मिलता है और न ही संपत्ति में, यानी सिर्फ कहने को वे नेपाली नागरिक हैं. भारत के साथ मधेश का एक अलग सम्बन्धियों वाला और पारिवारिक रिश्ता रहा है. मधेशी शुरू से लेकर अब तक एक ही प्रश्न से जूझते आये कि आखिर वे किस राष्ट्र के नागरिक हैं. और समय के साथ साथ मधेशियों के पहचान का ये संकट और गहराता गया. यदि कुछ पूंजीपतियों को छोड़ दिया जाये तो मधेश के लोगों के यह सवाल अब भी बना हुआ है कि वे खुद को किस देश का नागरिक कहें. नेपाल का या भारत का. फ़िलहाल चूंकि ये लोग नेपाल में रहते हैं और बहुत सारे लोगों को नेपाली नागरिकता भी प्राप्त है लेकिन पहले भी अधिकार सीमित थे और नए संविधान में भी अनदेखी की गई है। वहां की सेना में मधेश के लोगों को जगह नहीं मिलती क्यूंकि उनको पिछड़ा और कायर माना जाता है। ऐसे में सीमावर्ती इलाके में होने वाला विरोध भविष्य में भारत के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। 
समारोह के प्रमुख वक्ता विभूति नारायण राय ने कहा कि "मधेशी आन्दोलन का सबसे दुखद पहलु ये रहा है कि जब जब उन्होंने अपने नागरिक अधिकारों की बात ही है उन्हें भारत के साथ जोड़ दिया गया है। और भारत को भी बड़े भाई का रोल अदा करना होगा न कि बिग ब्रदर का। " वरिष्ठ परत्रकार अरविंद मोहन ने कहा कि "भारत और नेपाल के बीच रोटी-बेटी का संबंध है। ऐसे में हम उनका साथ देने को तैयार हैं लेकिन उनको अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी क्यूंकि हमारा हस्तक्षेप बाहरी हस्तक्षेप कहलाएगा जो दोनों देशों के संबंधों के लिए ठीक नहीं है" वहीं नेपाल के मौजूदा सासंद हरिचरण साह ने कहा कि "जैसा कि हम सब जानते हैं कि नेपाल में एंटी-इंडियन होने का अर्थ है सच्चा राष्ट्रवादी होना. यह और बात है कि भारत अब भी यह बात नहीं समझ पाया है और वो पहाड़ियों को ही अपने ज्यादा करीब पाता है." मधेशियों पर ये आरोप लगाये जाते रहे हैं कि ये कभी भी भारत विरोधी नहीं रहे इसलिए ये सच्चे नेपाली नहीं हो सकते. अभी भी जब राज्य विभाजन की बातें की गई हैं तो सबसे पहले यही कहा गया है कि अगर मधेश मजबूत हो गया तो भारत नेपाल में अपना अधिकार जमा लेगा। दरअसल यह एक आधारहीन डर है जो नेपाल के ज्यादातर राजनेताओं में बैठा हुआ है।  पर इन तमाम शोषण और दमन के बीच मधेशियों ने अपनी मेहनत से तराई-भूभाग को सबसे बेहतर फर्टाइल लैंड में बदल दिया है. पर जितने भी पहाड़ी शासक रहे चाहे वो राजा महेंद्र हो, राजा ज्ञानेंद्र या श्री 3 राणा सरकार सबने शोषण और दमन के बल पर मधेशियों की ज़मीने जब्त की। एक राजा वीरेंद्र को छोड़ दूसरे किसी शासक ने वहां जनता के दिल में जगह नहीं बनाई। इन तमाम दुविधाओं के बावजूद मधेशी अपना वजूद नेपाल में ही तलाशते हैं, जहाँ से सदियों से रहते आये हैं, अपने अधिकार पाने के लिए संघर्ष करते आये हैं और जिसे दिल से अपना मानते हैं. 
हमें इस तथ्य को स्वीकार करना चाहिए कि कोई भी संधि एकतरफा नहीं होती । जब किसी भी युद्ध का हल नहीं निकलता तो बात संधि पर आकर टिकती है। संधि में दोनों पक्ष बराबर पर होते हैं, अगर कोई पक्ष कमजोर होगा तो दूसरा उसपर काबिज हो जाएगा संधि नहीं करेगा। ऐसे में यह सोचना ही उद्वेलित करता है नेपाल के राजा ने ब्रिटिश इँडिया को क्या जबरदस्त चुनौती दी होगी। ठीक उसी तरह नेपाल के कुछ लोगों का यह मानना कि इस संधि से नेपाल को नुकसान हुआ सरासर गलत है। हमारी नजर में नेपाल को जो सबसे बड़ा लाभ हुआ वो यह कि इस संधि के बाद नेपाल एक संपूर्ण राष्ट्र के तौर पर स्थापित हुआ और बाद के दिनों में नेपाल संप्रभु राष्ट्रों की गिनती में शामिल हुआ। अन्यथा बाद में इतिहास नेपाल को एक रियासत तक सीमित रख जाता।

Sunday, December 7, 2014


बहुत पहले एक पत्रिका आती थी "विचार मीमांसा"... इस पत्रिका ने अपने शुरुआती दिनों में ही सर्कुलेशन में इंडिया टुडे को पछाड़ दिया था ... एक कवर स्टोरी थी "बंदर के हाथ में बिहार" तत्कालीन मुख्यमंत्री Monte Carlo की 21000 की स्वेटर पहने कुर्सी पर उकड़ू बैठे थे.. मोदी को घोंघा-मछली खिलाने वाले मुख्यमंत्री के लिए युवा पत्रकार कुछ शीर्षक सुझाएं..

Tuesday, January 26, 2010

डाउन मार्केट हिंदी पत्रकार !


ये कुंठा है, ये सच है या फिर कोई पीड़ा। 25 जनवरी को दिल्ली के इंडिया इटरनेशनल सेंटर में एक गोष्ठी का आयोजन हुआ, विषय था Can Rural Reporting Be Sexy. यहां हमें सेक्सी के शब्दार्थ पर जाने की बजाए उसका भावार्थ समझने की जरुरत है। और उस दर्द को समझने की जरुरत है जिसकी वजह से इस विषय पर संगोष्ठी का आयोजन हुआ। आयोजन में देश के बड़े-बड़े पत्रकार, समाजसेवी और यहां तक कि केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री भी शरीक हुए। ग्रामीण पत्रकारिता से जुड़े मुद्दे पर मंत्री का शरीक होना एक अच्छा शगुन है लेकिन इस गोष्ठी के बाद हमारे मन में दो सवाल पैदा हुए.एक गोष्ठी पर जिसे कमोबेश नरेगा और आरटीआई के इर्द-गिर्द सीमित कर दिया गया, और दूसरा यह कि इस देश के बड़े अँग्रेजी पत्रकार न जाने किस चश्मे से देश को देखते हैं, गांवों की जनता को देखते हैं और वो भी तब जब उनमें से कई खुद भी गांव से आते हैं या फिर आने का दावा करते हैं। इस गोष्ठी में अंग्रेजी पत्रिका आउटलुक के प्रधान संपादक विनोद मेहता और टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादक अरिंदम सेनगुप्ता मौजूद थे। दोनों देश के बड़े काबिल मैनेजर पत्रकार हैं। दोनों ने अपने प्रोडक्ट को उंचाइयां दी है। दोनों बाज़ार को समझते हैं। लेकिन एक पीड़ा है, एक दर्द है जो उसी संगोष्ठी में मौजूद आईबीएन 7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष की बातों से साफ नज़र आई। मेहता और सेनगुप्ता ने साफ तौर पर कहा कि आज का संपादक मालिकों के इशारे पर थिरकता है, मैनेजरों से गलबहियां करता है क्योंकि उसे प्रोडक्ट बेचना है, और तो और सेनगुप्ता ने कहा क्योंकि हमारा पाठक शहरी है इसलिए हमें गांवो की रिपोर्ट ज्यादा नहीं लुभाती। एक हद तक यह सच भी है लेकिन इससे बड़ा सच है कि हम जो पाठकों या दर्शकों को परोसते हैं उन्हें उसी से संतोष करना पड़ता है। दरअसल जनता के पास साधन नहीं है कि वो अपने हिसाब से अखबार छापे या फिर चैनल चलाए लेकिन जैसे ही उसके आस-पास की, उसके मन की बात की जाती है वो उसे अपना समझता है या फिर जो उसे परोसा जा रहा है उसी में बेहतर विकल्प की तलाश में रहता है। तभी तो आज भाषाई पत्रकारिता उफान पर है। अखबार ज़िले के पेज बना रहे हैं, राज्यों में कई-कई सेटेलाइट चैनल खुल रहे हैं। लेकिन दिल्ली में बैठे ये पत्रकार मैनेजर दिल्ली की पत्रकारिता को ही मेनस्ट्रीम पत्रकारिता मान बैठे हैं। आशुतोष ने एक और बात कही कि हमारा गांव और छोटे शहर समृद्ध हो रहे हैं..एक हद तक यह सच भी है औऱ हमारा बाजार भी अब वही लोग हैं लेकिन उस तरफ किसी का ध्यान नहीं जा रहा और जिसका जा रहा है वो उसका फायदा उठा रहे हैं। भाषाई पत्रकार खासकर हिंदी पट्टी से आनेवालों को दिल्ली में कैसा डाउन मार्केट समझा जाता है यह दर्द भी आशुतोष की बातों में झलका। इन सबके साथ मैं इन अंग्रेजी के बड़े पत्रकारों से कुछ कहना चाहूंगा जिन्हें शायद ग्रामीण मुद्दों की रिपोर्टिंग स्तरीय नहीं लगती, कि वो पाठकों को कैसा अखबार और कैसी पत्रिका देना चाहते हैं जिसमें कुछ कंटेंट हो या फिर सिर्फ मसाला। फिर मसाला परोसने के लिए बहाना ढूंढते हैं कि पब्लिक यहीं पढ़ना चाहती है। एक उदाहरण देता हूं मैं जब छोटा था तब मेरे घर (बिहार के एक छोटे से गांव में) पटना से छपने वाला एक अंग्रेजी अखबार The Indian Nation आता था। तब शायद बिहार में वो टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स से ज्यादा बिकता था। पटना में गंगा पर गांधी सेतु नहीं था इसलिए कोई भी अखबार शाम में मिलता था। उस अखबार को मेरे दादाजी हर रोज़ शाम को गांव के कई लोगों को पढ़कर हिंदी में सुनाते थे। जब थोड़ा बड़ा हुआ तो देखा कि तकरीबन 10-12 कॉपी मेरे गांव में आने लगी। लेकिन जानते हैं अब क्या हो रहा है। अभी पिछले महीने मैं अपने गांव गया था और दिल्ली की लत की वजह से टाइम्स ऑफ इंडिया या हिंदुस्तान टाइम्स लाने के लिए किसी को कहा तो उसे बगल के गांव जाना पड़ा, औऱ वहां भी जो शख्स अँग्रेजी अखबार खरीदता है वो दिल्ली से विस्थापित हुआ एक पत्रकार है। मेरे गांव में अब कोई अँग्रेगी अखबार नहीं पढ़ता इसलिए नहीं कि लोग पढ़ना नहीं जानते बल्कि इसलिए कि वो उनकी खबरें नहीं छापता। जहां अब पहले से ज्यादा पक्की इमारते हैं.... पहले से ज्यादा गाड़ियां हैं वहां अंग्रेजी अखबार नहीं बिकता क्योंकि वो उनके बारे में नहीं लिखता और आपको बता दूं कि ये वो हिंदी पट्टी है जहां हिंदी के अखबार 5 रुपये के बिकते हैं और वो भी लाखों में। रही बात विषय की क्या छापें वो तो हमें तय करना होगा कि हमें मूड्स सेक्स सर्वे गांवो तक पहुंचाना है या फिर उनके मूड की ख़बरें छापनी है। इन अँग्रेजी पत्रकारों की बातों को सुनकर कई बार सिहरन पैदा होती है और लगता है बचपन में जो पढ़ाया गया कि भारत किसानों का देश है, गांवों का देश है वो वाकई गुरुजी के डंडे के भय से बना हुआ था, सच कुछ और ही है। हकीकत ये है कि हम जिन्हें डाउन मार्केट समझ रहे हैं उनकी नज़र में हम खुद डाउन मार्केट हैं तभी तो हमें वहां कोई नहीं पढ़ता। इसलिए इस कांपलेक्स से बाहर आकर हमें गांवों से जुड़े मसलों पर सोचना होगा क्योंकि अब भी जनता हमें चौथा खंभा समझती है और यह विश्वास बना रहे इसी में हम सबकी भलाई है।

Friday, January 22, 2010

अपना मर्सिया पढ़ रहे टीवी चैनल


आर्यावर्त के पाठकों को नए साल की शुभकामनाएं। www.mediasarkar.com को लांच करने में व्यस्त था इसलिए काफी समय से कुछ लिख नहीं पाया. अब आप हमें यहां लगातार पाएंगे साथ ही www.mediasarkar.com पर भी आप हमसे रु-ब-रु हो सकते हैं।

टीआरपी की अंधी दौड़ में तो अब हद ही हो गई है पिछले दिनों यूटीवी के बिंदास चैनल पर एक अश्लील कार्यक्रम शुरु हुआ है इमोशनल अत्याचार। इस कार्यक्रम में बेवफाई का स्टिंग ऑपरेशन किया जाता है। लड़के-लड़कियां अपने साथी की लायलिटी टेस्ट करवाते हैं। चैनल खुफिया कैमरे के जरिए इन सारी घटनाओं को अंजाम देता है। पता नहीं आप महसूस कर पा रहे हैं कि नहीं लेकिन ये ट्रेंड बहुत ही खतरनाक है एक तो रिएलिटी शो के बहाने अब कैमरा हमारे घर में घुस गया है, पर्दे के इस पार आ गया है और वो सब हो रहा है जो एक सभ्य समाज को कतई शोभा नहीं देता। सच का सामना करने के ऐसे तरीके अपनाए जाते हैं कि सालों से बसा बसाया घर बिखर जाता है, पिछले जन्म का राज जानने के बहाने अंध-विश्वास को बढ़ावा दिया जा रहा है, देश भर से प्रतिभा ढूंढने के बहाने कम उम्र की लड़कियों को उनके माता पिता के सामने टू पीस बिकनी में नचवाया जाता है, कई कई ब्वाय फ्रैंड रखने वाली और लिव-इन रिलेशन में रह चुकी ऱाखी सावंत का स्वयंवर कराया जाता है और अब तलाकशुदा राहुल महाजन स्वयंवधु ढूंढने निकले हैं । जो कैमरा खबरों औऱ समस्याओँ को दिखाने तक सीमित था, समाज का चेहरा था हमें जानकारियां देने का काम करता था, हमें दुनिया की हकीकत से रु-ब-रु कराता था अब हमारे बेडरूम तक जा पहुंचा है। साफ है बंदर के हाथ में उस्तरा थमा दिया गया है नतीजा कैसा होगा बताने की जरुरत नहीं। अभी कुछ दिन पहले ही मतंग सिंह ने महिलाओँ के सशक्तिकरण के लिये खोले गए अपने चैनल पर रात बारह बजे से एक कार्यक्रम शुरु किया है – रात अभी बाकी है, बिल्कुल इंडिया टीवी पर दो-तीन साल पहले दिखाए जाने वाले कार्यक्रम इंडिया बोले की तरह। पहले ही एपिसोड में दर्शकों के ऐसे सवाल कि मेहमान औऱ महिला एँकर दोनों असहज नजर आए। इतना ही नहीं इसी ग्रुप का दूसरा चैनल जो पूर्वांचली समाज का होने का दावा करता है उस पर भी एक ऐसा ही कार्यक्रम स्थानीय़ भाषा में शुरु किया गया है और शुरु करने वालों को दलील कि यहां के लोगों को मुख्यधारा में जोड़ने की कोशिश की जा रही है आखिर ये टीवी चैनल वाले चाहते क्या हैं ? एक तो बेसिर-पैर के कार्यक्रम और उसपर तुर्रा ये कि दर्शक जो चाहता है वही हम दिखाते हैं। सवा सौ करोड़ की आबादी में दस हजार से भी कम दर्शक तय करते हैं कि पूरा देश क्या देखना चाहता है ? ये एक ऐसा ट्रेंड है जिसपर लगाम हमें जल्द ही लगानी होगी। कैसे हम दर्शकों का स्वस्थ मनोरंजन करें इस पर हम कभी विस्तार से चर्चा करेंगे फिलहाल हम बात करते हैं बिंदास के इमोशनल अत्याचार की। इस कार्यक्रम पर कुछ भी कहूं उससे पहले में ये बता देना चाहता हूं कि खुफिया कैमरे का इससे घटिया, वाहियात और फिजूल इस्तेमाल पहले कभी नहीं देखा... उमा खुराना कांड में भी नहीं ... शक्ति कपूर के मामले में भी नहीं। अभी तक स्टिंग ऑपरेशन के इतिहास में ये दो मामले मेरी नजर में काले धब्बे थे। एक में जहां एक औरत को गलत फंसाया गया औऱ उसकी अस्मिता तार- तार हुई और दूसरे में मेनका बन विश्वामित्र नहीं बल्कि एक आम इंसान की तपस्या भंग करने की कोशिश की गई। स्टिंग ऑपरेशन किसी खुलासे का जरिया हो सकता है यह एक्सपोजे का माध्यम है, इसे कभी भी किसी को फंसाने का जरिया नहीं बनना चाहिए। इतनी सी बात खुफिया कैमरे का इस्तेमाल करने वाले ज्यादातर लोग अभी तक ठीक से समझ नहीं पाये हैं। इन सबको कम से कम अनिरुद्ध बहल की एक क्लास लेनी चाहिए शायद दिमाग पर से थोड़ा पर्दा उठे लेकिन लगता है इन्हें तो इसकी जरुरत ही नहीं क्योंकि ये तो भंडाफोड़ करने नहीं बल्कि किसी को फंसाने, किसी की निजी जिंदगी में तांक-झांक करने आए हैं। इमोशनल अत्याचार में इस्तेमाल किए जा रहे तथाकथित खुफिया कैमरे पर ही हमारा पहला विरोध है और दूसरा जो इसका सबसे बुरा पहलू है जिसे जानकर आप ये सोचने को विवश हो जाएँगे कि आखिर किन पर भरोसा करें और किन पर नहीं। एक प्रेमिका एक प्रेमी का स्टिंग ऑपरेशन करवाती है, स्टिंग ऑपरेशन में उस लड़के की दूसरी प्रेमिका नजर आती है फिर दोनों लड़कियां मिलकर उस लड़के की जासूसी करवाते हैं और फिर दोनों साथ बैठकर उस लड़के को किसी तीसरी लड़की के साथ बैठकर फ्लर्ट करते देखते हैं वो तीसरी लड़की रिएलिटी शो की टीम का हिस्सा है। शो की लड़की जिस तरीके से उस लड़के को सरे-बाज़ार फ्लर्ट करती है और लड़के को फंसाने के वो हरसंभव प्रयास करती है जो सभ्य समाज में शोभा नहीं देता। इसे न्यूज चैनलों ने कई दिनों तक खूब भुनाया। इस प्रोग्राम को देखते ही कुछ शक होता है, रिएलिटी शोज पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं कि ये मैनेज्ड होते हैं लेकिन इमोशनल अत्याचार को देखने के बाद आपको यकीन हो जाएगा कि इनकी क्या हकीकत है, और इसे सच साबित कर दिखाया न्यूज चैनल न्यूज 24 ने। इस चैनल ने स्टूडियो में बिठाकर दोनों लड़कियों से बात की। इस बातचीत के दौरान ये साफ हो गया कि ये सब मैनेज्ड था। लड़कियां जिस तरीके से आपस में बात कर रही थीं उससे ये लग रहा था जैसे दोनों की काफी पुरानी जान पहचान हो इतना ही नहीं जब उन दोनों को आपस में ये बोला कि जवाब संभलकर देना कि इन्हें शक न हो तो सब साफ हो गया। इन दोनों लड़कियों में से एक एमटीवी के कार्यक्रम स्पिल्टिसविला में भी प्रतियोगी रह चुकी थी। मतलब पैसे के लिए कुछ भी हो रहा है। लड़कियां किसी को भी अपना प्रेमी बना रही हैं... लड़के पैसे के लिए कैमरे के लिए सामने लड़कियों से मार खा रहे हैं, फ्लर्ट कर रहे हैं। चैनल अपने टीआरपी के लिए कुछ भी कर रहे हैं इसे देखकर तो यही लगता है कि अब वो दिन दूर नहीं जब टीवी चैनल्स अपनी टीआरपी के लिये किसी की जान भी ले लेंगे और वो भी रिएलिटी शो के बहाने। लेकिन ये टीवी चैनल वाले इस बात को नहीं समझ रहे हैं कि विश्वास खोकर वो अपना ही मर्सिया पढ़ रहे हैं।

Friday, November 6, 2009

यूं जाना गुरुजी का




राम नाम सत्य है .... इस बोल के साथ जब दिन के तकरीबन एक बजे पार्थिव शरीर को कंधा दे रहा था तो पूरे शरीर में एक सिहरन सी हुई और इस कठोर सत्य पर विश्वास करना पड़ा कि अब कभी गुरुजी के दर्शन नहीं होंगे। पल भर में पिछला पांच साल घूम गया, जी पिछले पांच साल में ही मैं व्यक्तिगत तौर पर उनके थोड़ा करीब आ पाया था और वो भी बड़ी हिम्मत जुटाकर जबसे मैं जनसत्ता अपार्टमेंट में उनके करीब रहने लगा था। हां एक लेखक और पाठक का रिश्ता काफी पुराना था। सच तो यही है कि उनकी लेखनी पढ़कर ही लिखने का शौक जगा और उस उम्र में ऐसा लगता था कि बस हमने पत्रकारिता शुरु की नहीं कि समाज में क्रांति आ जाएगी, लेकिन जल्द ही नौकरी करने लगा और दुनिया को बताने लगा कि पत्रकार हो गया हूं। यही सच है आज जब मीडिया के बड़े बड़े दिग्गज सिर्फ नौकरी कर रहे हैं प्रभाष जी आखिरी सांस तक पत्रकारिता करते रहे। सच तो ये है कि हिंदी पत्रकारिता का आखिरी स्तंभ ढह गया। इस दुनिया से आखिरी पत्रकार चला गया और हम लोग सिर्फ नौकरी करेंगे। अब शायद ही कोई पत्रकार बम-बम करेगा। प्रभाष जी पत्रकारिता से देश का भविष्य संवारना चाहते थे और हम सब पत्रकारिता से अपना भविष्य संवारना चाहते हैं। इसी बुनियादी फर्क का नाम है प्रभाष जोशी। हम बड़े खुशनसीब हैं कि हम उस दौर में हैं जब हमने प्रभाष जी को बड़े करीब से देखा । शुरु में उनका लिखा पढ़ता तो मिलने की इच्छा होती लेकिन धारदार लेखनी देखकर सोचता शायद बड़े कड़क होंगे तो फिर मन करता रहने दो फिर कभी। ग्रेजुएशन करने दिल्ली आया तो धीरे- धीरे यदा कदा किसी संगोष्ठी, किसी समारोह में मिलने लगा, थोड़ी- बहुत बात भी कर लेता लेकिन भीड़ से बच बचाकर। और सोचता अपना लेखक-पाठक वाला रिश्ता ही सबसे अच्छा है। ऐसे ही काफी समय बीत गया। लेकिन हमें तो इतिहास का गवाह बनना था चाहे वो थोड़े समय के लिये ही क्यों न हो। अचानक वैशाली का अपना घर बेचकर मैं वसुंधरा जनसत्ता में रहने आ गया। उस समय गुरुजी यहां कभी-कभार आते थे, धीरे-धीरे लगभग हर सप्ताहांत आने लगे और फिर दिल्ली में होते तो ज्यादातर यहीं रहते। उनके आने का कार्यक्रम हमें कभी कभार ही मालूम होता फिर भी अक्सर कभी सीढ़ियों पर कभी लिफ्ट में मिल जाते कभी उनकी गाड़ी खड़ी देख रामबाबू से उनका कार्यक्रम जानने की कोशिश करता। उधर दूसरी तरफ मेरी पत्नी और बेटा गुरुमाता से स्नेह पाते रहे। बचपन से जिस प्रभाष जी को जानते रहे उनका ऐसा सानिध्य मिलेगा हमने कल्पना नहीं की थी। कोलकाता प्रेसींडेंसी कॉलेज में किसी समारोह के दौरान मेरी पत्नी पहली बार उनसे मिली थी। एक लेखक के तौर पर वो हम दोनों के प्रिय थे और यही वजह है कि जब हमें करीब आने का मौका मिला तो हमने उसे अपने हाथ से नहीं जाने दिया। टेलीविजन की नौकरी से समयाभाव के कारण मैं थोड़ा नुकसान में रहा और उनका सानिध्य मेरे बेटे और पत्नी को ज्यादा मिला। मेरे बेटे से पूछते बड़े होकर क्या बनोगे.... वो कुछ भी कहता तो कहते क्यूं क्रिकेट अच्छा नहीं लगता... तेंदुलकर बनना नहीं चाहते। प्रभाष जी सचिन के इतने बड़े फैन थे.....अगर प्रभाष जी से पहले तेंदुलकर का दौर होता तो निश्चय ही वो खुद बड़ा होकर तेंदुलकर बनना चाहते। गुरुजी ने अपनी इनिंग भी तेंदुलकर की तरह खेली, शानदार, जानदार... सभी गोलंदाजों की बखिया उधेड़ते हुए। हैदराबाद में सचिन ने जिस तरह पारी खेली उससे पंद्रह साल पुराने सचिन की याद आ गई। ठीक उसी तरह प्रभाष जी ने अभी चंद दिनों पहले कागद कारे में चेताया था- खबरों के बेचने के काले धंधे को रोकने के पुण्य कार्य में फच्चर मत फंसाओं... टिकोगे नहीं। सच मानिए ये सिर्फ गुरुजी ही लिख सकते थे।

Saturday, October 3, 2009

बापू


बापू की जयंती पर अपने ब्लॉग के पाठकों को एक छोटी सी भेंट... यह विचार मेरे मन में आज से सत्रह साल पहले आये थे जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय का छात्र था।

बापू !
अच्छा हुआ तुम स्वर्गीय हुए,
मरकर स्मरणीय हुए
अगर तुम जिंदा होते
न जाने कितना शर्मिंदा होते
देश की हालत देख रोए होते,
कितना कुछ ढोए होते,
अपनों के विरुद्ध अबतक
अनशन पर प्राण खोए होते
वियावान जंगलों से गुजर रही थी
देश की गाड़ी
उसे तो तुमने बचा लिया
जालिम लुटेरों से
पर--
शहर के बीच आकर
आखिर लूट ही ली गई
अपने ही सवारियों से
आजादी की गाड़ी

आप बताएं क्या देश के हालात पिछले सत्रह सालों में सुधरे हैं.. क्या हम बापू को सच्ची श्रद्धांजलि दे पा रहे हैं।

Monday, September 28, 2009

पत्रकारिता को खिलवाड़ मत बनाओ

जंग और प्यार में सब जायज है यह साबित कर दिया इस बार बंगाल पुलिस ने... बंगाल पुलिस की कारगुजारी आजकल सुर्खियों में है ... एक नक्सली नेता की गिरफ्तारी हो चुकी है और पुलिस इसे अपनी बड़ी सफलता मान कर अपनी पीठ थपथपा रही है। जाहिर है जिस एक शख्स ने लालगढ़ में हफ्तों राज्य की पुलिस को और देश की प्रशासनिक व्यवस्था को चुनौती दी हो उसकी गिरफ्तारी पर खुश होना लाजमी है... लेकिन सवाल उठता है कि जिस तरीके से पत्रकारिता को मोहरा बनाकर इस कारनामे को अंजाम दिया गया है वो ठीक है....और उपर से मीडियाघरानों की चुप्पी, बड़े पत्रकार होने का दावा करने वालों की खामोशी आखिर किस तरफ इशारा करती है।
छत्रधर महतो और बंगाल पुलिस के इस नाटक पर कुछ लिखूं उससे पहले मैं बता देना चाहता हूं कि मैं मौजूदा हालात में नक्सलवाद का समर्थक नहीं हूं लेकिन अपने पाठकों को ये भी साफ करता चलूं इन नक्सलियों के बीच हमने एक बार नहीं ... कई बार हफ्तों दिन गुजारा है..... इनके साथ जंगलों की खाक छानी है .... जंगलों में जानवरों और नक्सलियों के बीच सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा की है.... इसलिये मैं अपने अल्पज्ञान से इनको काफी करीब से देखा है और इनकी बुराइयों पर जमकर लिखा भी है। पत्रकारिता से इतर बिहार के कुछ जिलों में नक्सलवाद को पनपते हमने काफी करीब से देखा है जाना है, समानता की इनकी बातें हमें अपील करती रही है लेकिन बेवजह हत्याओँ को मैं विरोधी रहा हूं। महीनों इनके साथ बिताने के बाद हमें लगा कानू सान्याल और चारू मजूमदार का मिशन रास्ते में भटक गया है.... जहां शराब और लड़की के सिवा कुछ नहीं बचा और एक दौरे से आने के बाद मैंने लिखा कि ये विस्फोट करते हैं माओ के नाम पर, अवैध वसूली करते हैं लेनिन के नाम पर और हत्याएं करते हैं मार्क्स के नाम पर बावजूद इसके इनमें संभावनाएं हैं और सरकारी नीतियों के लचीलेपन की वजह से यह देश के लिए बाहरी आतंकवाद से बड़ा खतरा है। लेकिन यहां जरा गौर से समझने की बात है नक्सलवाद एक विचार है और विचार से छेड़छाड़ खतरनाक हो गया है... लेकिन जिस विचार को लेकर छत्रधर महतो ने लड़ाई शुरु की उसपर सरकार को गौर करने की जरुरत थी।
हम लौटते हैं अपने मुद्दे पर नहीं तो यह एक ऐसा विषय है जिसपर काफी कुछ लिखा जा सकता है। मुद्दा यह कि जिस तरीके से पुलिस ने पत्रकार का सहारा लिया क्या वो तरीका ठीक है। यहां कई बाते हैं..... मैं सबसे पहले उन पत्रकारों को कठघरे में खड़ा करता हूं जिनके बारे में कहा जा रहा है कि विदेशी एजेंसी के पत्रकार बने पुलिसवालों से महतो की मीटिंग तय कराई। क्या ये जानबूझकर था, इसपर मेरा ये मानना है कि ऐसा संभव नहीं है क्योंकि स्थानीय स्तर का काई पत्रकार ऐसा जोखिम नहीं ले सकता क्योंकि वो इतना जो जानता है कि अपनी पंचायत लगाकर कान काटने, उंगली काटने या फिर कई दिन उल्टा लटकाने के फैसले करने वाले ये लोग गद्दारी को कभी माफ नहीं करेंगे... हां लेकिन उस पत्रकार की एक गलती जरुर है कि उसने चंद पैसों के लालच में बिना ज्यादा जांच पड़ताल किये इन नकली एजेँसी के पत्रकारों पर भरोसा कर लिया और उनका ऐसा करना भी कई सवाल खड़े करता है... यहां भी बात समानता की आती है कि जिस स्ट्रिंगर की खबरों के सहारे न्यूज चैनल या राष्ट्रीय अखबार बड़े-बड़े खेल कर रहे हैं उन्हें चंद पैसों के लिये क्या करना पड़ता है मतलब साफ है कि इस पेशे में भी समानता नहीं है और अगर समानता की वकालत करता छत्रधर महतो अपनी लड़ाई लड़ रहा है तो क्या बुरा कर रहा है। अगर वो स्थानीय पत्रकार संपन्न होता तो उसे ऐसे काम करने की जरुरत नहीं पड़ती और फिर भी करता तो उसे ठोक बजाकर करता। दूसरी बात इन पुलिस वालों की .. आप सोचिए अगर किसी खबर का सच जानने के लिए अगर आप पुलिस की वर्दी पहन लें और बकायदा रिवॉल्वर लगाकर कहीं पहुंच जाएं.... तो क्या हमारे देश का कानून हमें ऐसा करने की इजाजत देगा, कतई नहीं... तो फिर एक दूसरे पेशे को हथियार के रुप में आजमाने के लिये पुलिसवाले दोषी क्यों नहीं है। दशकों से पत्रकार वहां पहुंचते रहे हैं जहां पुलिस-प्रशासन का जाना दूभर रहा है और वो सिर्फ इसलिये कि इस पेशे पर तमाम बुराईयों के बावजूद हर तबका भरोसा करता रहा है। ऐसे में नकली पत्रकार बनकर ऐसा करना न सिर्फ पत्रकारिता के साथ धोखा है बल्कि समाज के साथ भी सौतेला व्यवहार है क्योंकि ऐसी घटनाएं बार-बार दुहराई जाएंगी.... और फिर समाज के उस तबके का विश्वास हमसे उठेगा जो सामने नहीं आना चाहता लेकिन पत्रकार उनकी बातें मुख्यधारा तक पहुंचाते हैं। इसके दूरगामी परिणाम बहुत ही भयानक होंगे क्योंकि जब समाज का कोई भी एक या उससे अधिक हिस्सा मुख्यधारा से कटेगा और उसके संवाद भी स्थापित नहीं होगा तो जाहिर है विवाद होगा क्योंकि – जहां संवाद नहीं है वहीं विवाद शुरु होता है। और फिर न तो किसी छत्रधर महतो को हम, आप या पुलिसवाले जान पाएँगे और न हीं ऐसी गिरफ्तारी हो सकेगी। कुल मिलाकर बंगाल पुलिस का ये कदम उस आतंकवादी से ज्यादा बेहतर नहीं है जिसने पत्रकार के वेश में वीडियो कैमरे में बम लगाकर अफगानिस्तान लोकप्रिय नेता अहमद शाह मसूद की हत्या कर दी थी। और इन सबसे ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि इस मसले पर कोई कुछ बोल नहीं रहा.... ये खामोशी पत्रकारिता के लिए और खासकर खोजी पत्रकारिता के लिए जहां सूत्र काफी मायने रखते हैं ... बेहद खतरनाक है।

Tuesday, September 1, 2009

मतभेद सही मनभेद न हो

कई दिनों से सोच रहा हूं कि कुछ लिखूं, लेकिन लिख नहीं पा रहा हूं क्योंकि काफी समय बाद रोज-रोज के काम से ब्रेक लिया है तो उसका भरपूर आनंद ले रहा हूं...... पर कुछ भाइयों ने आज लिखने पर मजबूर किया... खैर.... आज जिस मुद्दे की बात करना चाहता हूं उस पर सीधे आने की बजाए आप लोगों को एक छोटा सा किस्सा सुनाना चाहता हूं......
एक गांव में एक सज्जन ने कुछ किताबें पढ़ ली, थोड़ी बहुत दूसरी भाषाएं भी सीख ली और रोज गांव वालों को उपदेश देने लगे....और गांव वाले भी बड़े चाव से सुनते क्योंकि गांव वाले कम पढ़े लिखे लोग थे इसलिए उन पढ़े लिखे सज्जन की बात उन्हें अच्छी लगती, उसी गांव में एक चाचा थे उन्हें ये व्यक्ति नागवार गुजरता... उन्हें लगता कि हमारा अनुभव कुछ और कहता है और ये सारी उल्टी बातें करता है। एक दिन तो हद हो गई जब उन सज्जन ने कहा कि ‘ मैं भगवान राम को कभी माफ नहीं कर सकता... भगवान राम ने जो माता सीता के साथ किया, लव-कुश के साथ किया उसके लिये मैं उन्हें कभी माफ नहीं कर सकता’ साथ ही वो मर्यादा पुरुषोत्तम को भला-बुरा कहने लगा. जो उसकी बातें सुन रहे थे अचंभे में पड़ गए कि भाई इस सज्जन ने क्या कह डाला, इसे क्या हो गया ... तभी चाचा बीच में से उठे और बोले – बेटा जब भगवान राम तुमसे माफी मांगने आएं तो उन्हें बिल्कुल माफ मत करना, उन्हें खूब जलील करना और कहना कि हे राम तूने क्या किया..फिलहाल दूसरी बातें कर, फिर चाचा बोले... जब राम तुमसे माफी मांगने आएंगे तब तो तुम उन्हें माफी नहीं देगा न...। वो तो तुमसे माफी मांग ही नहीं रहे और तू है कि इस जिद पर अड़ा है कि तू कभी उन्हें माफ नहीं करेगा। अचानक बैठक का माहौल बदल गया... और सबको पता चल गया कि इस व्यक्ति की कितनी गहरी पैठ है।
मैं ये किस्सा आप लोगों को इसलिये नहीं सुनाना चाह रहा था कि मैं किसी की तुलना भगवान राम से कर रहा हूं या फिर किसी के बचाव की मेरी कोई मंशा है बल्कि मैं सिर्फ ये कहना चाहता हूं कि मित्रों किसी के बारे में भी लिखने से पहले अपने गिरेबान में झांको, उसके किये की तुलना अपने कर्मों से करो औऱ सोचो कि उस शख्स ने जो हासिल किया है क्या वो यूं ही था... तो फिर आपको वो सब क्यों नहीं मिल रहा। जी हां मैं बात आदरणीय प्रभाष जी की ही कर रहा हूं, कुछ ब्लागिए भाई लोग उनके पीछे नहा धोकर पड़ गए हैं। दरअसल सच ये है कि ये लोग उनके जरिए अपनी प्रसिद्धि चाहते हैं, इन भाई लोगों को मीडिया समाज के भी लोग ठीक से नहीं जानते (उनके इतिहास पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता नहीं तो मैं पथ-भ्रमित हो जाउंगा ) लेकिन ये लोग हैं कि किसी बड़े नाम का सहारा लेकर दिन-रात मशहूर होने की जुगत में लगे हैं और जब कोई उनका इष्ट-मित्र उनसे ऐसी हरकतें नहीं करने को कहता है तो उनका जवाब होता है अरे यार आज तो इस खबर पर 2 हज़ार हिट्स मिले हैं इसे कैसे रहने दूं । आखिर फार्मूला जो है --- हिट है तो फिट है.... लेकिन दोस्तों ये हिट-फिट का फार्मूला पत्रकारिता में ज्यादा दिनों तक नहीं चलता। मैं पूछता हूं इन ब्लागियों से कि ईमान से बोलना कि जब पत्रकारिता में आने की सोची और अपने छोटे शहर में कुछ लिखने पढ़ने लगे तो नहीं सोचते थे आखिर ये पत्रकार कैसा जीवट है जिसे प्रधानमंत्रियों का भी डर नहीं रहा, मालिकों की मनमानी नहीं सुनी, मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि जरुर सोचते होगे इस इंसान की जीवटता के बारे में ।
प्रभाष जी ने जो लिखा उसपर मतभेद हो सकता है, आप भी जाहिर कीजिए... हमारे मित्र दिलीप मंडल ने भी जाहिर किया लेकिन बड़ी सधी हुई भाषा में.... मतभेद होना चाहिए लेकिन मनभेद तो मत पालिए, और उपर से आलम ये कि एक एक लेख पर पंद्रह – पंद्रह कमेंट्स और वो भी बेनामी.... ये कैसी पत्रकारिता है यहां आपलोगों की कुंठाएं सामने आती हैं अगर प्रभाष जी का आलोक जी का ये फिर किसी भी जी का विरोध करना है तो अपने नाम के साथ कीजिए... लेकिन आप करेंगे कैसे क्योंकि आप कर ही नहीं सकते लिजलिजे हैं आप। आप को तो सिर्फ विवाद चाहिए क्योंकि उस विवाद से हिट्स मिलते हैं आपको - और फिर आप सभी के लिए एकमात्र लक्ष्य है मीडिया की सबसे बड़ी वेबसाइट भड़ास4मीडिया को मात देना। कम से कम उस रास्ते पर तो चलो जिस रास्ते पर वो चल रहा है। खबर देता है, मुद्दों पर बहस करता है और वहां बहस करने वाला बेनामी नहीं होता क्यों कि जो बेनामी है वहीं बेमानी है। जो लोग इन मुद्दों पर लगातार बहस किये जा रहे हैं वो अपने अतीत को भूल गये हैं। और जो लोग उस पर कमेंट्स कर रहे हैं दरअसल वो किसी दफ्तर में बैठकर आफिस टाइम में ब्लागिंग कर रहे हैं...काम नहीं आने की वजह से या फिर काम नहीं कर पाने की वजह से गालियां सुनने वाले दफ्तर के किसी कोने में बैठकर उस मालिक का पैसे जाया कर रहे हैं जो उन्हें वो काम करने के लिये देता है। कमेंट्स करने के लिये अगर इन्हें साइबर कैफे में पैसे देने पड़े तो ये कमेंट्स भी नहीं लिखे और मैं ये इसलिये दावे के साथ कह सकता हूं क्योंकि अक्सर मेरे पास दूसरे चैनलों से फोन आता था कि – सर आपके दफ्तर से फलां फलां व्यक्ति मेरे साथ पिछले कई घंटों से चैटिंग पर है तो प्लीज कोई जिम्मेदारी का काम इन्हें मत दीजिएगा नहीं तो निराशा होगी। दरअसल यही हकीकत है इनकी। ये नेट का इस्तेमाल तरक्की के लिए नहीं विनाश के लिये कर रहे हैं। और हां अपने सुधी पाठकों को बताता चलूं कि ये जो ब्लॉगिए हैं फिलहाल बेरोजगार हैं...दिल्ली के कई अखबारों में उठापटक चल रही है .. इन्होंने भी अपनी जोर आजमाइश शुरू कर दी है ... जल्द ही नौकरी करने लगेंगे और फिर आपको ये दिलचस्प मगर बेमतलब बहस पढ़ने को नहीं मिलेगी। अगर आपको यकीं नहीं आता तो एक-एक लाख की नौकरी का ऑफर देकर देखिए इन्हें।

Saturday, August 29, 2009

रोको मत अपनी कलम अमन के गीत लिखो

समिधा सुलगी, श्रृंगार सुलगने वाला है,
रोको मत अपनी कलम अमन के गीत लिखो।

नभ की गंगा का पानी कुछ गंदला सा है
मौसम पहले से कुछ बदला-बदला सा है
बदरी सी चारों ओर क्षितिज पर छायी है
मानो धरती की आग उभरकर आयी है
लिखते आए सदियों से गीत समर्पण के
इस कोलाहल में नवजीवन के गीत लिखो

समिधा सुलगी, श्रृंगार सुलगने वाला है,
रोको मत अपनी कलम अमन के गीत लिखो।

छिटका दो चिनगारी सागर के पानी पर
झलरा दो मोती किस्मत की पेशानी पर
पेशानी पर लिख दो इतिहास जमाने का
कुछ असर जिंदगी पर हो नए तराने का
दुनियावालों को नए तराने गाने दो
तुम नए छंद में नए सृजन के गीत लिखो

समिधा सुलगी, श्रृंगार सुलगने वाला है,
रोको मत अपनी कलम अमन के गीत लिखो।

अंगड़ाई लेने को दुनिया अकुलाती है
उपर देखो धरती की आह धुंआती है
इसे मजलूमों की आह न समझो, आंधी है
इस आंधी के पीछे लेनिन है, गांधी है
कुछ नए सितारे आसमान पर चमकेंगे
इस उथल-पुथल में परिवर्तन के गीत लिखो

समिधा सुलगी, श्रृंगार सुलगने वाला है,
रोको मत अपनी कलम अमन के गीत लिखो।

Tuesday, August 25, 2009

मेरे जीवन के साथ बड़ी मजबूरी है ....

मेरे जीवन के साथ बड़ी मजबूरी है,
मैं वीरानों में गीत सुमन के लिखता हूं।

मैं लिखता हूं इसलिए कि मधुबन शरमाए,
मैं लिखता हूं इसलिए कि जीवन दुहराए,
लिखता जाता उत्थान पतन जग-जीवन का
मुझको न तनिक परवाह पपीहा अकुलाए।
धरती के पन्नों पर आंसू की स्याही से-
मैं सुनसानों में गीत नयन के लिखता हूं

मेरे जीवन के साथ बड़ी मजबूरी है,
मैं वीरानों में गीत सुमन के लिखता हूं।

मेरे गीतों का प्राण सुबह का तारा है
गंगा का पानी है झेलम की धारा है
ज्वारों से लिखता गीत समय के धारों पर
गीतों से अम्बर को दिन-रात पुकारा है
गीली मिट्टी से बने दीप की पांती से
मैं बलिदानों में गीत नमन के लिखता हूं

मेरे जीवन के साथ बड़ी मजबूरी है,
मैं वीरानों में गीत सुमन के लिखता हूं।

मेरे गीतों की कड़ी जवानी बन जाए
चिंतन की कोमल घड़ी कहानी बन जाए
हर शब्द-शब्द के साथ कल्पना भी उतरे
हर चरण-चरण जीवन का दानी बन जाए।
चरणों की आकुल-आहट से युग के पथ पर
मैं अभियानों में गीत गमन के लिखता हूं,

मेरे जीवन के साथ बड़ी मजबूरी है,
मैं वीरानों में गीत सुमन के लिखता हूं।

Monday, August 17, 2009

ये सब पब्लिसिटी स्टंट है

15 अगस्त को जब देश आजादी की 63वीं सालगिरह मना रहा था तब अचानक शाहरुख पुराण ने एक साथ पूरे देश की जनता को झकझोर दिया मानो कोई सुनामी आया हो... सारे न्यूज चैनलों पर बड़े-बड़े अक्षरों में ब्रेकिंग न्यूज- शाहरुख के साथ बदसलूकी, किंग खान के साथ अमेरिका में दुर्व्यवहार और न जाने क्या क्या। और हो भी क्यूं न शाहरुख ठहरे देश के सुपर स्टार, नौजवानो के आदर्श। न्यूज चैनलों ने इस खबर को ऐसे परोसा कि जैसे अमेरिका ने अभी माफी नहीं मांगी तो भारत सीधे पेंटागन पर हमला कर देगा और मनमोहन सिंह व्हाइट हाउस को कब्जाने खुद कूच कर जाएंगे। मैं खुद खबरों से खेलने का गवाह हूं इसलिये अच्छी तरह जानता हूं कैसे न्यूज रुम में अफरा-तफरी मची होगी... कौन कैसे चिल्लाया होगा और देखते देखते मनमोहन सिंह के लाल किले के प्राचीर से दिए गए भाषण पर चर्चा करने की बजाए सब शाहरुखमय हो गये होंगे। मैं ब्रेक पर हूं लेकिन चूंकि इन्हीं न्यूज चैनलों का हिस्सा हूं इसलिये आपको बड़ी शिद्दत से बता सकता हूं कि ये खबर जैसे ही न्यूज रूम में टपकी होगी सबकी बांछे खिल गई होंगी क्योंकि उससे पहले सब इसी बात को तरस रहे होंगे कि आखिर आज पंद्रह अगस्त है आजादी की 63वीं सालगिरह.. आज दिखाएं क्या ... दिन भर चलाएँ क्या... प्राइम टाइम में परोसें क्या...आदि-आदि। शाहरुख ने खबरों के लिहाज से शिथिल 15 अगस्त को जान डाल दी। सब तरफ तेरा जलवा ....। शाहरुख के इस कदम को जरा गौर से देखिये .. वो जिस कार्यक्रम में भाग लेने अमेरिका गये थे वहां एक दिन पहले भी जा सकते थे या यूं कहें कि कुछ घंटे पहले भी जाते तो ये बात हिंदुस्तान में 14 की रात को ही हो जाती लेकिन शाहरुख तो शाहरुख ठहरे उन्हें अपने देश की जनता और मीडिया पर पूरा भरोसा है उन्होंने ऐसा दिन चुना जब सारा देश छुट्टियां मना रहा हो और न्यूज चैनलों पर आजादी के परवानों के किस्सों के अलावा परोसने को कुछ न हो। और ठीक ऐसा ही हुआ अचानक एक खबर फ्लैश हुई और देखते देखते ....। शाहरुख कमाल के मैनेजमेंट गुरु हैं... एक तो उन्होंने तारीख चुनी आजादी की सालगिरह जिस दिन देश के निठल्लों में देशभक्ति की भावना हिलोंरे मारने लगती है। और फिर जिस फ्लाइट से वो गये उसमें अपना सामान भी नहीं ले गये (जैसा कि अमेरिकी इमिग्रेशन अधिकारी का कहना है) उनका सामान दूसरी फ्लाइट से आ रहा था लिहाजा उनको जांच के लिये तो रुकना ही था। हकीकत में शाहरुख के साथ क्या हुआ या फिर शाहरुख ने अपने साथ क्या क्या होने दिया ये तो सिर्फ वही बता सकते हैं लेकिन उन्होंने जिस तरह अपनी नई आनेवाली फिल्म “माई नेम इज खान” को प्रमोट किया वो वाकई काबिलेतारीफ है। नेवार्क एयरपोर्ट से जब उन्होंने अपने घर, अपने सेक्रेटरी को फोन किया तो साथ ही अपने कांग्रेसी सांसद मित्र राजीव शुक्ला को फोन करना नहीं भूले, हालांकि राजीव शुक्ला ने उनकी मदद की, एंबेसी में बात की लेकिन अगर गौर से देखें तो शुकला जी को फोन करना भी एक स्ट्रेटजी के तहत था क्योंकि शाहरुख ये बखूबी जानते हैं कि उनपर जो आंच आई है उसे भारतीय न्यूज चैनल खूब भुनाएंगे तो क्यों न खबर ब्रेक करने का सेहरा उनके मित्र के चैनल को मिले जिसके बारे में कहा जाता है कि उसमें शाहरुख ने भी पैसे लगाए हैं। इतना ही नहीं जब ये खबर दावानल की तरह न्यूज चैनलों में फैली तो हर कोई शाहरुख से बात करने की जुगत में लग गया.... लगभग हर चैनल से शाहरुख ने फोन पर बातचीत की और बातचीत में बार बार बोला माइ नेम इज खान , शाहरुख चाहते तो माइ नेम इज शाहरुख खान भी बोल सकते थे। लेकिन उन्होंने यहां भी बड़ी बारीकी से अपने फिल्म को प्रमोट कर दिया। दरअसल ऐसे ही हैं शाहरुख, आज जिस नस्लवाद का सताया हुआ खुद को बताते हुए नहीं अघा रहे वही शाहरुख पिछले महीने मुंबई में इमरान हाशमी को एक सोसाइटी द्वारा घर न दिये जाने के मामले पर इमरान को नसीहत दे रहे थे। अंग्रेजी-हिंदी में खुद इतना फर्क करते हैं कि न कभी मंच पर हिंदी बोलते सुने जाते हैं और न ही जल्दी किसी हिंदी न्यूज चैनल पर इंटरव्यू देते हैं लेकिन ये हिंदी न्यूज चैनल वाले हैं कि शाहरुख को देखा नहीं कि लार टपकाते-दुम हिलाते नजर आते हैं। ये तो थी बात शाहरुख की अब जरा फिल्म इंडस्ट्री और मीडिया को गौर से देखिए। अभी कुछ दिनों पहले ही इससे भयानक हादसा पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के साथ हुआ। खबर चलाई गई, ब्रेकिंग भी चली, संसद में हंगामा भी हुआ, मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने एफआईआर दर्ज कराने की बात भी कही लेकिन हुआ क्या । न तो इस घटना के विरोध में बॉलीवुड से कोई मुखर आवाज सामने आई। रसोई से लेकर नासा तक हर मु्द्दे पर अपनी बेबाक राय रखने वाले महेश भट्ट ने भी चुप्पी साध ली। शाहरुख की खबर में लटके-झटके थे , शाहरुख की खबर के साथ दीपिका और प्रियंका चोपड़ा के फोनो चलाए जा सकते थे और ये सारे खेल कलाम की खबर के साथ नहीं हो सकता था लिहाजा वो खबर ठीक से खबर नहीं बन सकी। न्यूज चैनलों के लिए शायद कलाम उतने बड़े मुसलमान नहीं है जैसे शाहरुख हैं क्योंकि शाहरुख बार बार कहते हैं माई नेम इज खान। नेताओं के लिये कलाम के दिल में उतना दर्द नहीं है जितना शाहरुख के लिये है क्योंकि उनके बच्चे कलाम के नहीं शाहरुख ऑटोग्राफ चाहते हैं। कलाकारों की इज्जत होनी चाहिए लेकिन नई पीढ़ी के लिए आदर्श क्या हो इस पर हमें गंभीरता से सोचना होगा, और कलाम ने किस तरह अपनी प्रतिक्रिया दी थी इसका जिक्र इसलिये नहीं करुंगा क्योंकि वो फिर कलाम और शाहरुख की तुलना हो जाएगी और ये गुस्ताखी किसी हिंदुस्तानी को नहीं करनी चाहिए। बाकी ब्रेक के बाद ।

Tuesday, August 4, 2009

रात को ओढ़ लूँ...
रात में खो चलूँ
रौशनी उतार कर
आज खुद से मिलूँ
प्रज्वलित हो चलूँ
आज खुद ही जलूँ
सूर्य बन कर उगूँ
आभा बन कर जगूँ
भस्म गर हो गई
बीज बन कर जियुँ
अंकुरित हो सकूँ
जिन्दगी बन सकूँ
स्वर के लय पर…
शब्द के आशय में...
स्नेह के अहसास में….
सोच के पँख पर….
एक तरंग बन सकूँ…
एक सदिश की तरह
चल सकूँ...
छू सकूँ…
आज मैं...
काश मैं...
मैं बन सकूँ

Monday, August 3, 2009





जयंती की जय हो

हम जिस जयंती की जय-जयकार कर रहे हैं उसे आपलोग नहीं जानते होंगे। लेकिन हमें यकीन है कि जब आप जानेंगे तो आप भी हमारे सुर में सुर मिलाएंगे। उपर वाला भी क्या क्या रंग दिखाता है ? हमारी आपकी सबकी हकीकत जानने के लिये अलग अलग तरीके अपनाता है। चलिए आपको उलझाते नहीं हैं बता देते हैं ... जयंती महज 3 महीने की है और उसके दिल में छेद है....... उसके माता पिता इस हैसियत में नहीं है कि उसका इलाज करा सकें.... जयंती ऐसी कि आप देखें तो आपका दिल भर आए..... जी कलेजे से चिपकाने को हो, हर संभव प्रयास करने के बाद भी उनकी उम्मीद टूटती जा रही है लेकिन उपरवाला निर्दयी नहीं है..... भूले भटके जयंती के पिता की मुलाकात इंडिय़ा न्यूज चैनल के उर्जावान रिपार्टर विजयलक्ष्मी से हो जाती है और फिर धीरे-धीरे सबकुछ बदलने लगता है .. वो रिपोर्टर इस बच्ची की मदद हर कीमत पर करने की ठान लेती है.... एक रिपोर्ट फाइल करती है और चैनल कई घंटो तक इस बच्ची के माता पिता को स्टूडियो बिठाकर लोगों से इसकी मदद की गुहार लगाता है..... जयंती के माता -पिता की उम्मीदें जगती हैं.... रिपोर्टर देश के सबसे बड़े अस्पताल एम्स में अपने संबंधों से बातचीत करती है और वहां के डॉक्टर हर संभव मदद और रियायत की बात भी करते हैं लेकिन अब भी जयंती को सत्तर हजार रुपये की जरुरत है... न्यूज चैनल पर जिस दिन खबर दिखाई गई थी उस दिन कई लोगों ने मदद करने का आश्वासन दिया लेकिन अभी तक कोई सामने नहीं आया है .... जयंती के माता पिता की उम्मीदें फिर टूटने लगती है क्योंकि डॉक्टर जल्द से जल्द ऑपरेशन की बात कर रहे हैं......। इसी बीच एक 'भोर' नाम की एक संस्था जयंती को जीवनदान देने आती है । इस ट्रस्ट के लोगों ने भी चैनल पर खबर देखी है औऱ उसकी मदद करने की सोची है.... भोर ट्रस्ट के जरिए एम्स को पच्चीस - पच्चीस के दो चेक दिए जाते हैं यानी कुल पचास हजार और फिर जयंती को एम्स में भर्ती कर लिया जाता है ।

आज जयंती आइसीयू से बाहर आ गई है... उसका ऑपरेशन सफल रहा है ... डॉक्टर भी खुश हैं..... माता-पिता की कल्पना तो आप खुद कर सकते हैं... साथ ही भोर ट्रस्ट के कुछ अधिकारी फिर अस्पताल आए हैं उनके चेहरे पर भी संतोष है और सबसे ज्यादा खुश है वो रिपोर्टर जिसकी मेहनत से इस नन्हीं जान की जान बची है .... आज इस भागमभाग में भी कुछ लोगों को दूसरों की चिंता है ..... इन सबको साधुवाद ।

Sunday, August 2, 2009

कोई फर्क नहीं पड़ता !

फर्क बस इतना था कि चीरहरण हस्तिनापुर में नहीं पाटलिपुत्र में हुआ । फर्क बस इतना था कि पांडव कौरवों के साथ थे। राहगीर सभासद की भूमिका में थे और मौन थे। न कोई शकुनी था और न कुछ दांव पर लगा था ? न कौरवों का अपमान हुआ था न कोई न कोई द्रौपदी थी और न कोई दुर्योधन, फिर भी पाटलिपुत्र की सड़कों पर चीरहरण हुआ। स्टेट कैपिटल से कैपिटल स्टेट तक बहस जारी है। चीरहरण पर सियासी महाभारत छिड़ गया

संस्कार, संस्कृति , सामाजिक मर्यादा और नैतिकता से भरे बयानों का सिलसिला जारी है । पीड़ित लड़की के बयान दर्ज किए जा रहे हैं। कड़ी कार्रवाई होगी। दोषियों को बख्शा नहीं जायेगा।सरकारी भोंपू सभ्य़ और सुसंस्कृत नागरिकों को लगातार भरोसा दिला रहा है। पुलिस हरकत में है और अदालत अपराधियों को सजा सुनाने के लिए तत्पर। न्याय होगा।
कुछ पकड़े जायेंगे, कुछ बच निकलेंगे। कुछ को सजा मिलेगी, कुछ बाइज्जत बरी कर दिये जायेंगे, लेकिन जूही के जिस्म से कपड़ा जिस तरह नोचा गया, सरेआम उसे जिस तरह खसोटा गया, वो सिलसिला कभी रूकेगा? सड़क पर उसके कपड़े एक बार नोचे गए। पुलिसिया जांच और पूछताछ के दौरान भी यही सब दोहराया जाएगा। जूही को बार बार नोचा जाएगा, क्योंकि होटल के कमरे से निकलकर सड़क पर निर्वस्त्र जूही अब देश की हर गली, गांव और कस्बे में पहुंच गई है। चाय और पान की दुकानों पर बहस इस बात पर नहीं हो रही है...न्याय कब होगा? दोषियों को सजा कब सुनाई जाएगी और कब मुख्यमंत्री इस बात की घोषणा करेंगे कि चीरहरण करने वाले सलाखों के पीछे हैं। अब नहीं होगा किसी का सरेआम चीरहरण। बहस इस बात पर हो रही है कि जूही सिंदूर बेचती थी या शरीर। किसी राकेश के कहने पर वो किसी के साथ होटल के कमरे में क्यों पहुंच गई। और किस तरह से वो शोहदों के बीच फंस गई। उसके कुछ तो किया होगा, कुछ तो उसका भी कसूर होगा। भला एक हाथ से ताली कैसे बज सकती है ? इस तरह के एक नहीं बल्कि कई सवाल हैं जो उन लोगों के मन को भी मथ रहे हैं, जो सामाजिक नैतिकता और मर्यादा के नाम पर उन तमाम राकेश सिंहों को हजार हजार लानतें भेज रहे हैं। लेकिन यकीन मानिए ये वही लोग हैं जो रात के अंधेरे में ऐसी खुशबुओं के जिस्म पर लार टपकाते हैं। इनमें से बहुत सारे लोग तमाशबीन की तरह चीरहरण देखते रहे। पाटलीपुत्र की सड़क पर एक हाथ नहीं उठा बचाने को। बिहार की राजधानी में चादर का एक टुकड़ा नहीं मिला जूही की तार तार आबरू को ढकने को। पाटलीपुत्र में वस्त्र की नहीं ईमान की कमी है। चारों तरफ से नुचती हुई जूही को देखकर तमाशबीनों की आंखों में खोट आ गया। इसलिए उन तमाशबीनों की शर्म से गर्दन नहीं झुकी और न उसे बचाने को कोई हाथ उठा। तमाशबीनों की आंखों में जूही की जवानी चुभ गई। इसलिए उसके अधनंगे शरीर को ढकने के लिए वस्त्र का कोई टुकड़ा नहीं मिला, और जिनको इस सबसे कोई सरोकार नहीं था उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा। आखिर किसी बात से किसी को क्यों कोई फर्क नहीं पड़ता? लोग क्यों ये सब एक तमाशबीन की तरह देखते रह गए? क्या पाटलीपुत्र की सड़क पर जूही के साथ जो कुछ हुआ वो कोई नौटंकी का खेल था? लेकिन हकीकत यही है कि पाटलीपुत्र में अब किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता और वैसे भी वो तो पतुरिया है, जो अपने जिस्म का कारोबार करती है। और जो होता है वो अच्छे के लिए हीं होता है। उसकी किस्मत में जो बदा था वही उसके साथ हुआ। इस लफड़े में फंसना किसी शरीफ का काम नहीं है क्योंकि....

सबको फिक्र है
कि बीच में कैसे भी न फंसे उसकी चौकी
कि उस पर ही जीते जायेंगे सारे गढ
सारी तलवारें वहीं चमकेंगी
पुलिस के बूटों का वहीं होगा गश्त
वहीं पर लूटे जायेंगे राहगीर
बीच में कोई नहीं फंसना
चाहता है
हर कोई चाहता है किनारे से
देखना, नौटंकी का खेल

कहां से शुरु करूं, कैसे शुरु करूं समझ में नहीं आता... तुम्हारे बारे में सब अपनी व्यथा शब्दों में उकेर रहे हैं, लेकिन तुम्हारे बारे में लिखना और ये सोचकर लिखना कि तुम अब नहीं हो चाहकर भी नहीं हो पा रहा है फिर भी मैं चाहता हूं कि अब जब तुम नहीं हो तुम्हारे बारे में कुछ लोग मेरे जरिए भी जाने....या यूं कहूं कि लोग तुम्हारे जरिए मुझे भी जानें.... मेरे अभिन्न भी ये जाने कि तुम मेरे लिए क्या थे.... लोग ये जाने कि मुझे कितना आश्चर्य हुआ था जब तुमने ये बताया था कि तुम मुझसे उम्र में सालों बड़े हो क्योंकि तुम्हें देखकर तो ऐसा अहसास बिल्कुल नहीं होता था। और यही वजह है कि में अपने से छोटा समझ तुम्हें - तुम कहने लगा था और फिर ये आदत बनी रह गई... चाहकर भी तुम, आप में तब्दील नहीं हो पाया और होती भी कैसे – रिश्तों में तुम की गर्मी- आप में कहां। याद है शैलेंद्र तुमने मुझे कैसे लगे लगाया था जब मैंने कहा था कि मैं एक शैलेंद्र सिंह को जानता हूं जो जिंदगी को जानने का दावा करते हैं... तुमने पूछा कैसे तो मेरा जवाब था उनकी किताब के जरिए, तुमने तड़ से सवाल दागा मिले हो कभी.. मैंने बोला नहीं लेकिन मैं तुम्हें सुनाता हूं उनकी चार पंक्तियां-

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पर मैं क्या करूं मेरी तो नियति ही यही है

फिर मैंने बोला था किसी को जानने के लिए उसकी लेखनी को जानिये सब जान जाएंगे तुमने मुझे गले लगाया तब मुझे एहसास हुआ कि पिछले छ महीने से हम इतने करीब क्यों आए- तुम्हारी “जानता हूं जिंदगी” इसकी एक कड़ी थी। शैलेंद्र की पहली किताब – जानता हूं जिंदगी- दरियागंज के संडे मार्केट से मैंने 1996 में खरीदी थी, लेकिन भाई से पहली मुलाकात उसके तीन साल बाद हुई। सच कहूं शैलेंद्र तुम जिंदगी के बारे में कुछ नहीं जानते थे सिर्फ जानने का दावा करते थे, अगर जानते होते तो जाने के लिए इतनी जल्दी नहीं करते- जैसे- जैसे जिम्मेदारी बढ़ रही थी वैसे वैसे तुम नाबालिग हो रहे थे.। जब कभी हम साथ होते तुम खिलंदड़पन से बाज नहीं आते... भाभी की मौजूदगी में किसी अनजान से भी फ्लर्ट करना नहीं भूलते... और ये सब मुझे जब अच्छा नहीं लगता तो तुम्हारा एक ही डॉयलॉग – गीता पढ़ो--- वैसे भी हमारी-तुम्हारी मुलाकात के पहले छ महीने तक मुझे कम पढ़ा लिखा टीवी का पत्रकार समझते रहे--- धीरे धीरे जब मैं तुमसे कविता की भाषा में बात करता तो तुम मुझे अपने करीब पाते..... तुम बेचैन रहते थे.... कम समय में बहुत कुछ करना चाहते थे.. और यही बेचैनी मुझमें देख तुम्हें थोड़ी संतुष्टि भी मिलती। आज मैं ये कह सकता हूं कि तुम्हें जानने का दावा कोई चाहे कितना भी करे लेकिन जान नहीं पाया..। अभी तो एक हफ्ता भी नहीं बीता था..जब तुमने ये कहा था बड़े न्यूज डायरेक्टर हो गये हो, मिलने की फुर्सत नहीं है फोन करने का टाइम नहीं है ..... सुधर जाओ नहीं तो बहुत मारुंगा..... मैंने कहा कुछ तो इज्जत करो यार- मेरा बेटा चार साल का हो गया है... मुझे वो इज्जत नहीं चाहिए.... मैं मार खाने को तैयार हूं क्या तुम आओगे, नहीं न तुम झूठे निकले.... पिछले कुछ महीनों से सिर्फ ऐसी ही बात करने के लिए मुझे फोन करते थे ...... क्योंकि शायद ये बातें तुम सिर्फ मुझे ही कह पाते थे क्योंकि मैं तुम्हें इस हद तक बर्दाश्त करता था। तुम मुझपे इतना हक भी जताते थे लेकिन मेरी सुनते बहुत कम थे.....। इसी संडे को मिलने का वादा किया था तुमने.....लेकिन इस बार भी मेरी नहीं सुनी । तुम सुनना ही नहीं चाहते थे । तुमने सिर्फ अपनी करने की ठानी थी। ये जिद किसी को अच्छी नहीं लगी शैलेंद्र – न तुम्हारे दोस्तों को न ही तुम्हारे विरोधियों को । अपनी हरकतों से हमारी रात काली करते और सुबह चाय पर हमारा गुस्सा भी झेलते और बड़े सहज होकर जब तुम ये कहते दोबारा ऐसा नहीं होगा तो मैं मन ही मन सोचता था कब तुमसे बदला लूं ऐसे ही सारी रात परेशान करके।

मैं जब आजतक में नौकरी करता था तो साउथ दिल्ली में रहता था और भविष्य में भी उधर ही रहने की सोचता था लेकिन तुम मुझे अपने पास लेकर आए। तुम्हारी ही जिजिविषा थी कि मैंने 24 साल की उम्र में घर खरीदा...... मुझे लगता है कि पिछले जन्म में तुमपर मेरा कुछ उधार था जो इस जन्म में न सिर्फ तुमने सूद समेत चुकाया बल्कि कुछ नया कर्ज चढ़ा गए, जो शायद ही मैं उतार पाउं। न तो तुम हमें अपने करीब लाते... न मेरी आँखों से “वो” (वो की कहानी फिर कभी) पर्दा हटाते जिसकी आड़ में मैं अपने पिछले कई सालों से जिए जा रहा था और न मैं जिन्दगी की इस राह पर चलता...जिसमें मेरे साथ कदम मिलाकर चलने वाली पत्नी और बहुत प्यार करने वाला बेटा मिला...। मेरी जिद और मेरी कुछ गलतियों से मुझे पांच साल बाद ही अपना घर बेचना पड़ा तुम भी काफी दुखी हुए लेकिन हमेशा हौसला देते रहे...। आज जब मैं फिर अपने घर में रह रहा हूं तुम साथ छोड़ गये। तुम्हें याद है शैलेंद्र जब मुझे...मुझे(मैं अपने आपको दुनिया का सबसे निडर आदमी मानता हूं) अपने घर में नींद नहीं आती थी.... अकेले डर लगता था...मुझे जबरदस्ती अपने घर में सुलाते ... क्या-क्या कहूं शैलेंद्र और किससे कहूं, तुम्हें तो कोई फर्क पड़ता नहीं उपर से मजे ले रहे होगे... आपलोगों को बताऊं अभी शैलेंद्र क्या कहता…सब गदहे हैं और तुम घोड़ा हो...सुधर जाओ...

क्या क्या लिखूं... कहां खत्म करूं समझ नहीं आता, शैलेंद्र ... छोड़ो यार ..... ।